श्वसन की क्रियाविधि ( Methodology of Respiration )

 

श्वसन की क्रियाविधि ( Methodology of Respiration )

·       ‌जब हम श्वास लेते है तो बाहर की वायु फुफ्फुस कूपिकाओं में प्रवेश करती है, इसे अंतःश्वसन कहते है। वक्षगुहा का फैलाव डायाफ्राम व पसलियों के बीच जुड़ी पेशियों के संकुचन के कारण होता है ।

·       ‌इससे वक्ष की पसलियों की उपरिमुखी एवं बहिर्मुखी गति होती है जिसके कारण वक्षगुहा का आयतन बढ़ जाता है । इससे वायु का दबाव कम हो जाता है तथा बाह्य वायु नासाद्वार , श्वास नली एवं श्वसनी द्वार फुफ्फुस में प्रवेश करती है ।

·       ‌कूपिका ऑक्सीजन युक्त वायु से पूरित हो जाती है जहां कोशिकाओं में उपर्युक्त मात्रा में रक्त प्रवाहित होता रहता है । कूपिकाओं की पतली भित्ति के माध्यम से रक्त कोशिकाएं गैसों का आदान - प्रदान करती है ।

·       ‌ऑक्सीजन विसरण द्वारा कूपिका से रक्त में प्रवेश करता है जहां से इसकी आपूर्ति ऊतकों तक कर दी जाती है । ऊतकों से कार्बन डाईऑक्साइड विसरित होकर रक्त में पहुँचती है जहां वह फुफ्फुस कुपिकाओं तक निःश्वसन के लिए पहचा दिया जाता है । बाद में कार्बन डाइऑक्साइड श्वास नली एवं नासाद्वार से बाहर निष्कासित कर दी जाती है । ऐसा बक्षगुहा के सामान्य आकार ग्रहण करने के कारण होता है जिसमें डायाफ्राम तथा पसली पेशियों शिथिलित होती है। इस प्रकार श्वास लेने में दो घटनाएं अंतःश्वसन एवं निःश्वसन होती है ।

·       ‌श्वास लेने की क्रिया अनैच्छिक ( स्वतः ) होती है पर इसकी गति मस्तिष्क में उपस्थित श्वसन केंद्र द्वारा नियंत्रित की जाती है । सामान्य अवस्था में श्वसन की दर 15-18 बार प्रति मिनट होती है । कठिन परिश्रम व व्यायाम के समय ऑक्सीजन की मांग बढ़ जाती है तथा श्वसन दर 20-25 गुना बढ़ जाती है ।

·       ‌प्रत्येक सामान्य श्वास के समय अंत : श्वसित एवं नि : श्वसित वायु के आयतन को ज्वारीय आयतन ( Tidal Volume TV ) कहते है , जो लगभग 500 ml होता है । कभी - कभी वायु की अतिरिक्त मात्रा बलपूर्वक अंत : श्वासित कर ली जाती है ।

·       ‌सामान्य ज्वारीय आयतन के अतिरिक्त वायु की जो मात्रा अंत : श्वासित की जा सकती है , उसे अंत : श्वसन सुरक्षित आयतन ( Inspiratory Reserve Volume , IRV ) कहते है , जो 2500-3000 ml वायु के बराबर होती है ।

·       ‌इसी प्रकार सामान्य ज्वारीय नि : श्वसन के अलावा वायु की एक अतिरिक्त मात्रा का बलपूर्वक निःश्वसन किया जा सकता है । फुफ्फुस की इस क्षमता के माप को नि : श्वसन सुरक्षित आयतन ( Expiratory Reserve Volume , ERV ) कहते है । नि : श्वसन सुरक्षित आयतन लगभग 1000 वायु के बराबर होता है ।

·       ‌अपने अत्यधिक क्षमता तक बलपूर्वक नि : श्वसन के पश्चात् भी वायु की कुछ मात्रा फुफ्फुस में बची रह जाती हैं । इसे अवशिष्ट आयतन ( Residual | Volume , RV ) कहते है । अवशिष्ट आयतन लगभग 1200 ml वायु के बराबर होता है ।

·       ‌प्राणायाम विधि में इस सांस को भीतर या बाहर रोका जाता है । सांस रोकने को कुम्भक कहा जाता है । भीतर सांस रोकना आंतरिक कुम्भक और बाहर सांस रोक देना बाह्य कुम्भक कहलाता है । प्राणायाम ' अष्टांग योग ' के 08 अंगों में एक अंग है । प्राणायाम को नियमित अभ्यास करने से फेफड़े शुद्ध और शक्तिशाली आयुमण्ड बने रहते है।

·       ‌श्वसन गैसों का रक्त व ऊतकों के बीच आदान - प्रदान होता है । ऊतकों में ऑक्सीजन का उपयोग हो जाता है , कार्बन डाइऑक्साइड मुक्त होती है । जो रक्त फुफ्फुस से ऊतकों तक ऑक्सीजन द्वारा लाया जाता है । उसमें ऑक्सीजन की सांदता अधिक व कार्यन डाइऑक्साइड की सांद्रता कम होती है । सांद्रता के इस अंतर के कारण ऊतकों व रक्त कोशिकाओं के बीच गैसों का आदान - प्रदान होता है।

·       ‌श्वसन का अंतिम चरण सारा अणुओं ( जैसे ग्लूकोज ) का ऑक्सीकरण है , जिससे कर्जा मुक्त होती है । यह कोशिकाओं के माइटोकॉन्ड्रिया में होता है ।

·       ‌श्वास लेने की क्रिया के प्रत्येक चक्र में लगभग 500ml वायु का अंत : श्वसन व नि:श्वसन होता है । श्वास की दर 15-18 चक प्रति मिनट होती है । 24 घंटों में | हम 15000 लीटर वायु का अंतःश्वसन करते है । इसलिए हमें प्रदूषणविहीन वायु में | श्वास लेना चाहिए ।

 


श्वसन गुणांक व श्वसन भागफल ( Respiratory Quotient RQ )

श्वसन क्रिया मैं उत्सर्जित CO2 ( कार्बनडाइ ऑक्साइड ) तथा उपयोग में लाई गयी O2 ( ऑक्सीजन ) के अनुपात को श्वसन गुणांक व श्वसन भागफल ( RQ ) कहते है ।



प्रत्येक भोज्य पदार्थ का एक निश्चित RQ होता है ।
    
भोज्य पदार्थ                           RQ मान
1.
कार्बोहाइड्रेट                        1.0
2.
वसा                                   0.7 ( < 1 ; एक से कम )
3.
प्रोटीन                                0.8 ( < 1 ; एक से कम )
4.
कार्बनिक अम्ल                   4.0 ( > 1 ; एक से अधिक )
5.
मिश्रित भोजन                    0.85 ( < l ; एक से कम )
6.
अनॉक्सी श्वसन                   ( अनन्त )

·       ‌यदि RQ का मान एक है इसका तात्पर्य श्वसन क्रिया में उत्सर्जित CO , की मात्रा उपयोग की गयी 0 , की मात्रा के बराबर है ।

 

·       ‌यदि RQ का मान एक से कम है इसका अर्थ यह है कि श्वसन क्रिया में की मात्रा उपयोग की गयी 0 , की मात्रा से कम है ।

श्वसन संबंधी रोग ( Respiratory Disorders )

    1. ब्रोंकाइटिस ( श्वसनीशोथ )

·       ‌यह श्वसनी का शोथ अथवा सूजन है जिसकी पहचान श्वसनी के आंतरिक स्तर में उपस्थित सेरोम्युकम ग्रंथि व गॉब्लेट कोशिकाओं की अतिवृद्धि से होती है । गाढ़े हरे - पीले रंग के थूक के साथ लगातार खांसी की होना इसके लक्षण है । यह मूल रूप से संक्रमण का सूचक है जिसके परिणामस्वरूप श्लेष्मा का अत्यधिक स्राव होता है ।

·       ‌यह धूम्रपान व कार्बन मोनॉक्साइड जैसे वायु प्रदूषक के संपर्क में आने के कारण भी हो सकता है ।

रोकथाम के उपचार

·       ‌धुआ , रसायन एवं प्रदूषक जैसे कारकों के संपर्क से बच कर श्वसनी शोध की रोकथाम की जा सकती है ।

·       रोग के आधारीय संक्रमण का उपचार उचित प्रति जैविकों द्वारा किया जाता है । श्वसनी - विस्फारक ( ब्रॉन्कोडायलेटर ) दवाओं ( श्वसनी मार्ग को विस्तृत करने व चिकनी पेशियों को शिथिल करने के लिए ) के उपयोग से तत्कालिक आराम मिलता है ।

 

2.श्वसनी दमा ( Bronchial Asthma )

·       ‌इसकी पहचान श्वसनिका की भित्ति में पाए जाने वाली चिकनी पेशियों के अति संकुचन के द्वारा होती है ।

·       ‌यह प्रायः बाह्य पदार्थों के प्रति श्वसनिका के अति संवेदनशीलता के कारण होता है , जो इसके द्वारा जाने वाली वायु के साथ आ जाते हैं । खांसी व श्वसन  विशेषकर निःश्वसन में कठिनाई इस रोग के प्रमुख लक्षण है ।

·       ‌वायु मार्ग के श्लेष्मा झिल्ली द्वारा अत्यधिक श्लेष्मा के साव के कारण श्वसनी व श्वसनिका दोनों का मार्ग अवरूद्ध हो सकता है ।

 रोकथाम के उपचार

·       ‌यह एक एलर्जिक रोग है , अत : बाह्य पदार्थों व एलर्जिक के संपर्क से बचाव | इसके रोकथाम का सर्वोत्तम उपाय है।

·       ‌अगर रोगी बहुत कम संख्या में प्रत्युर्जकों के प्रति संवेदनशील है , तो ! अल्पसंवेदनीकरण ( विशिष्ट प्रत्युर्जकों के अल्पमात्रा का संपर्क ) भी इसके रोकथाम । का एक अन्य साधन है ।

·       ‌इस रोग के उपचार में संक्रमण के उन्मूलन हेतु प्रति जैविकों को उपयोग एवं श्वसनी विस्फारक दवाओं के साथ - साथ श्वास यंत्र उपयोग से तात्कालिक आराम मिलता है। 

 

3. एंफाइसिमा

‌यह श्वसनी अथवा कूपिका का असामान्य फैलाव है , जिसके कारण इन भागों का लचीलापन समाप्त हो जाता है । इसके परिणामस्वरूप कूपिका सदैव , यहां तक कि नि : श्वसन के पश्चात भी वायुपूरित रहती है व फुफ्फुस का आकार बढ़ जाता है । इस अवस्था का कारण धूम्रपान व दीर्घकालिक श्वसनी शोथ है ।

रोकथाम व उपचार

·       एंफाइसिमा फुफ्फुस का एक दीर्घकालिक अवरोधी रोग है , जिसमें कूपिका | के अनुत्क्रमणीय फैलाव के कारण इसका स्थायी उपचार नहीं है , फिर भी उपचार | द्वारा रोग का बढ़ना कम किया जा सकता है । 

·       ‌इसका उपचार भी लाक्षणिक होता है । इसके लिए श्वसनी - विस्फारकों , प्रतिजैविकों व ऑक्सीजन उपचार को उपयोग होता है ।

·       ‌प्रदूषक व धुएं के दीर्घकालिक संपर्क ( धूम्रपान व अन्य किसी प्रकार का । प्रदूषक ) से बचकर इस रोग की रोकथाम हो सकती है ।

 

4. न्यूमोनिया ( Pneumonia )

·       ‌यह फुफ्फुस की कूपिकाओं का तीव्र संक्रमण व शांथ है । इस रोग का प्रमुख कारण स्ट्रेप्टोकोकस न्युमोनी ( Streptococcus Pneumonia) नामक जीवाणु  का संक्रमण है । यदा - कदा अन्य जीवाणु अथवा कवक , प्रोटोजोवा , वाइरस तथा । माइकोप्लाज्मा भी इसके लिए उत्तरदायी हो सकते है ।

·       ‌शिशु , वृद्ध व प्रतिरक्षा स्वीकार्य ( Immuno Compromised ) व्यक्ति इस रोग के प्रति अतिसंवेदनशील होता है ।

·       ‌इस रोग में कूपिका कोष के अधिकतर स्थान श्वेत रक्त कणिकाओं सहित । तरल से भरे होते है । शोथयुक्त कूपिकाओं में ऑक्सीजन के अंतर्ग्रहण पर प्रतिकूल | प्रभाव पड़ता है , जिसके परिणामस्वरूप रक्त में ऑक्सीजन स्तर कम हो जाता है ।

रोकथाम व उपचार

·       ‌न्यूमोनिया का प्रमुख कारण संक्रमण है , अतः प्रतिजैविक के उपयोग द्वारा । संक्रमण दूर कर इसका उपचार किया जाता है ।

·       व्यक्तियों में समय पर किए गए उपर्युक्त टीकाकरण द्वारा रोग की रोकथाम की जा सकती है ।

 



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