मानव पाचन तंत्र (Human Digestive System)

मानव पाचन तंत्र (Human Digestive System)

पाचन क्रिया की खोज:-

Ø वास्‍तव में यह एक संयोग से हुआ था। सन्‍ 1822 में अमेरिका में लेक मिशीगन के पास एक गाँव में एक परिवार के सुबह एक कारखाने के मजदूर, एलेक्सिस सेंट मार्टिन के पेट में अचानक बंदूक चल जाने के कारण गोली लग गई। घाव गहरा था तथा अमाशय फट जाने के कारण भोजन बाहर निकल रहा था।

Ø विलियम ब्‍यूमों नाम फौजी डॉक्‍टर ने उपचार करके उसे बचा तो लिया किंतु घाव भरते समय घाव के स्‍थान देहभित्‍ति और आमाशय के किनारे आपस में जुड़ गये। इस तरह सेंट मार्टिन के पेट पर एक स्‍थायी खिड़की बन गयी। इससे मार्टिन को खानें-पीनें में तो कोई दिक्‍कत नहीं थी, उसे हर समय घाव पर पट्टी बाँधनी पड़ती थी, जिससे खाना बाहर न खिसक जाये।

Ø सेंट मार्टिन को कारखाने में नौकरी पर बहाल करने से मना कर दिया तब डॉक्‍टर व्‍यूमों ने दया करके उसे अपना घरेलू नौकर के तौर पर रख लिया। एक दिन नौकर अपनी चारपाई पर लेटा हुआ था कि डॉक्‍टर व्‍यूमों ने उसे आमाशय में माँस के गीले टुकड़े देखे। उसी समय व्‍यूमों को आहारनाल की पाचन क्रिया के अध्‍ययन का स्‍वर्ण अवसर मिला।

Ø डॉ. व्‍यूमों ने अपने प्रयोगिक व्‍यक्ति को तरह-तरह के आहार खिलाकर कुल मिलाकर 238 प्रयोग किये तथा सन्‍ 1833 में अपनी पुस्‍तक एक्‍सपेरीमेन्‍ट्स एण्‍ड ऑब्‍जर्वेशन्‍स ऑन गैस्ट्रिक ज्‍यूस एण्‍ड दि फिजिओलॉजी ऑफ डाइजेशन में प्रयोगों द्वारा प्राप्‍त निष्‍कर्षों को लिखा जो आज भी अपने विषय में मानक मानी जाती है। इसी समय से प्रायोगिक शरीर क्रिया विज्ञान का प्रारम्‍भ हुआ । यह महत्‍वपूर्ण खोज एक संयोग से हुई थी।  



मानव पाचन तंत्र:-

Ø  जटिल, ठोस एवं अघुलनशील भोज्‍य पदार्थों के अणुओं का भिन्‍न-भिन्‍न एंजाइमों द्वारा व विभिन्‍न रासायनिक क्रियाओं से सरल, तरल एवं घुलनशील अणुओं में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को पाचन कहते है, तथा इस प्रक्रिया में भाग लेने वाले अंग तंत्र के समूह को पाचन तंत्र (Digestive System) कहते हैं।

Ø  अध्‍ययन की सुविधा की दृष्टि से पाचन तंत्र को 02 मुख्‍य भागों में बांटा जाता है। -

                           I.          आहार नाल (Alimentary Canal)

                         II.          सहायक या सम्‍बद्ध पाचन ग्रन्थियाँ (Associated Digestive Glands)

A.    आहर नाल (Alimentary Canal) :-

Ø  यह एक कुंडलित, पेशीय नली है जो मुख से गुदा तक फैली रहती है। जब यह पूर्ण रूप से विस्‍तारित होती है तब इसकी लंबाई लगभग 6-9 मीटर तक हो जाती है। यह अनेक विशिष्‍ट भागों की बनी होती है। ये निम्‍न क्रम से व्‍यवस्थित होती है।

1.     मुखगुहा

2.     ग्रसनी

3.     ग्रसिका (ग्रासनली)

4.     आमाशय

5.     आँत

6.     मलाशय

7.     गुदा

Ø  सहायक पाचक अंग जैसे लार ग्रंथियाँ, अग्‍नाश्‍य, यकृत और पित्‍ताशय (पित्‍त तंत्र) भी मुख्‍य पाचक तंत्र से नलिकाओं के द्वारा एक श्रेणीबद्ध रूप से संयोजित होते है।

Ø  आहार नाल की दीवार में 04 प्रमुख प्रकार के स्‍तर पाए जाते है। जिसमें विभिन्‍न प्रकार की कोशिकाएं पायी जाती है।


Ø  आस्‍तरित गुहा से प्रारंभ करने पर, सबसे अंदर की परत म्‍यूकोसा (नम व घर्षण रहित आसतरित उपकला) जिसमें स्‍त्राव व अवशोषण गुणधारी कोशिकाएं होती हैं। म्‍यूकोसा के आधार पर कुछ अरेखित या चिकनी पेशियां होती है।

Ø  म्‍यूकोसा के ठीक बाहर सबम्‍यूकोसा (रूधिर, लिंफ व तंत्रिकाओं युक्‍त मुलायम संयोजी ऊतक) होता है।

Ø  सबम्‍यूकोसा बाहर मस्‍कुलेरिस एक्‍स्‍टर्ना परत पाई जाती है, जो कि आंतरिक वर्तुल पेशियों व बाह्य अनुदैर्द्ध पेशियों की बनी होती है। आहार नाल की सबसे बाहरी परत को रेशीय स्‍तर या सेरोसा कहते है।

Ø  म्‍यूकोसा लाखों वलयों या अंगुलीनुमा प्रवर्धों का बना होता है, जिसे अंकुर या विलाई कहते हैं, तथा ये आहार नाल गुहा की ओर लक्षित होते है। इन विलाई में रूधिक कोशिकाओं केंद्रीय लेक्‍टीयल लिंफ वाहिनी सहित अन्‍य लिंफ वाहिनीयों का एक जाल फैला रहता है। इसके अतिरिक्‍त विलाई की सतह पर स्थित कोशिकाएं असंख्‍य रोमनुमा प्रवर्ध होते है। जिसे सूक्ष्‍मांकुर या ब्रश बार्डर कहते हैं। ये पोषकों के अवशोषण हेतु सतही क्षेत्र में और अधिक वृद्धि कर देते है।

Ø  म्‍युकोसा की उपकला पर करोड़ों एककोशीय श्‍लेष्‍मा ग्रंथियां पाई जाती हैं जिन्‍हें श्‍लेष्‍मा या गाबलेट ग्रंथि कहते है। ये कोशिकाएं मुख्‍यतया श्‍लेष्‍मा का स्‍त्राव करती हैं जो स्‍नेहक एवं रक्षण का कार्य करता है, तथा उपकला सतह को नष्‍ट होने एवं पाचित होने से बचाता है।  

 


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