बरनौली का सिद्धांत (Bernoulli’s Theorem)
बरनौली का सिद्धांत (Bernoulli’s
Theorem)
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जब कोई असंपीड्य व अश्यान
द्रव एक स्थान से दूसरे सथान तक धारा-रेखी प्रवाह में प्रवाहित होता है, तो उसके
मार्ग के प्रत्येक बिन्दु पर इसके प्रति एकांक आयतन की कुल ऊर्जा (दाब ऊर्जा), गतिज ऊर्जा व स्थितिज
ऊर्जा का योग एक नियतांक होता है। बरनौली की प्रमेय एक प्रकार से प्रवाहित द्रव (गैस) के लिए ऊर्जा-संरक्षण का सिद्धांत है।
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चिमनी से धुआँ कैसे बाहर आ
जाता है ? कार का परिवर्त्य शीर्ष तेज चाल में ऊपर को क्यों उभर जाता है ? आँधी
में आपने अपने छातों को ऊपर की ओर पलटता देखा होगा। इन सभी तथ्यों को बरनौली के सिद्धांत के आधार पर समझा जा सकता है।
बरनौली का समीकरण
* बरनौली ने एक समीकरण विकसित किया जो कि इस सिद्धांत को
मात्रात्मक रूप से अभिव्यक्त करता है।
P+1/2pv2+phg = नियतांक
* इस समीकरण के 03 आधार है।
1. तरल असंपीड्य है जब यह चौड़े मुँह की नली से संकरे मुंह की
नली में प्रवेश करता है तो इसका धनात्व अपरिवर्तनीय रहता है।
2. तरल अश्यान व्युत्पत्ति में श्यानता के प्रभाव को ध्यान
में नहीं नरखा जाता है।
3. तरल की गति धारारेखीय होती है।
बरनौली के प्रमेय के अनुप्रयोग
A. प्रवाहमापी (वेंटुरीमीटर): यह एक ऐसा उपकरण है जो नली
में बहते हुए द्रव के प्रवाह की दर को मापने के लिए प्रयोग में लाया जाता है।
उपकरण को प्रवाह नली में प्रवेश कराया जाता है इसमें एक दाबमापी होता है। जिसमें दो नलियां एक ऐसी नली
से जुड़ी होती है।
अधिक वेग वाले बिंदुओं पर दाब का मान कम होता है क्योंकि दाब ऊर्जा और गतिज ऊर्जा के योग का मान स्थिर रहता है। यह वेंचुरी सिद्धांत कहलाता है।
I. कणित्र: जब रबर बल्ब A को दबाया जाता है तब हवा B नली के संकरे द्वार से उच्च वेग से निकलती है और इस कारण इसके आस-पास कम दाब
का क्षेत्र निर्मित हो जाता है। द्रव (इत्र या रंग) बर्तन से नली में ऊपर की ओर
प्रवाहित होने लगता है और नोजल N से बाहर निकलता है। जब द्रव
नोजल में पहुँचलता है तो हवा की धरा नली B से इसे बारीक फुहार के रूप
में बहाती है।
II. स्प्रेगन: जब पिस्टन अंदर की तरु आता
है तो यह संकरे रंध्र ‘o’ से हवा को अधिक वेग से
निकालता है जिसके कारण आसपास कम दाब का क्षेत्र बन जाता है, द्रव बर्तन के सिरे
(किनारे) से जुड़ी पतली नली से जो ठीक ‘o’ के नीचे खुलती है, खींच लिया जाता है। पिस्टन से निकलने वाली हवा के द्वारा
नली के किनारे पहुँचने पर द्रव बारीक
फुहार के रूप में छिड़क दिया जाता है।
III. बुन्सेन ज्वालक: जब गैस N नोजल से बाहर निकलती है तो
उसका वेग अधिक होने कारण इसके आस-पास दाब कम हो जाता है, इसके साथ हवा पार्श्व
छिद्र A से अंदर की ओर तेजी से बढ़ती है और गैस में मिल
जाती है। यह मिश्रण प्रज्वलित करने पर गरम नीली लौ के साथ जलने लगता है।
IV. कार्बुरेटर: कार्बुरेटर एक ऐसी युक्ति
है जो मोटर कार के इंजन के सिलिंडर को हवा और पेट्रोल का समुचित (संतुलित) मिश्रण
प्रदार करने के लिए उपयोग में लायी जाती है। इंजन के सिलिन्डर के अंदर मिश्रण के
जलने से ऊर्जा निकलती है। पेट्रोल को प्ल्वी कक्ष में रखा जाता है। पिस्टन की
गति के कारण किनारे A पर दाब कम हो जाता है। इसी
कारण वायु बाहर से अंदर की ओर अधिक वेग से पहुँचती है। यही कारण है कि नोजल B पर दाब कम हो जाता है। (B पर संकरे मार्ग के कारण वहाँ
पर खींची गई वायु का वेग अधिक हो जाता है।) अत: B नोजल से पेट्रोल बाहर आ
जाता है जो अंदर आने वाली (बाहर से) वायु से मिल जाता है। तब वाष्पीकृत पेट्रोल व
वायु (ईंधन) A नली से होता हुआ सिलिंडर में पहुँच जाता है।
V. कभी-कभी जब कार्बन या
अपद्रव्य इकठ्ठा हो जाने से नोजल B बंद है तो इससे पेट्रोल का
प्रवाह रुक जाता है व ईंधन न जाने के कारण काम करना बंद कर देता है। अत: नोजल को
खोल कर साफ किया जाता है।
VI. एयरोफायल: जब कोई ठोस वायु में घूमता
या गति करता है तो प्रवाह रेखाएं बन
जाती हैं। वायुयान का आकार विशेष रूप से बनाया जाता है। जब वायुयान अपने पथ पर
दौड़ता है तो उच्च वेग वाली प्रवाह रेखाएं बन जाती हैं। ऊपरी सिरे पर प्रवाह
रेखाओं की अधिकता के कारण वहां वायु का वेग बढ़ जाता है, और यह अपेक्षाकृत कम दाब
का क्षेत्र बन जाता है। इस दाब में अंतर के कारण वायुयान पर एक बल ऊपर की ओर लगने
लगता है और वह ऊपर उठ जाता है।
“प्रवाह रेखाओं की अधिकता के कारण उस क्षेत्र पर वायु वेग अधिक रहता है और दाब
कम हो जाता है।”




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